Poem

किश्तों की ये जिंदगी

किश्तों की ये जिंदगी, किश्तों का आसमान
किश्तों की ये बंदगी, किश्तों के अरमान

वो चांद असमां पर हाय, किश्तों पर जी रहा है रे
उम्मीदो का सूरज हाय, धीरे धीरे ढल रहा है रे
अब आंखो मे आंसू लाने पर भी लगेगी चुंगी.
हम चिंखना चाहते हैं मगर चुप्पीया खड़ी नंगी.
किश्तों की ये सांसे है, किश्तों के यहां इमान

किश्तों की ये जिंदगी, किश्तों का आसमान
किश्तों की ये बंदगी, किश्तों के अरमान

हम जिंदगी से खुशीयां बुनकर हंसते जी जायेंगे रे
गम का प्याला पीकर हम और खिलते जायेंगे रे
और अभिलाषा रखेंगे की सूरज निकलेगा कभी.
और सूरज के बीज जमींन में बोयेंगे हम अभी.
ढूंढेंगे ऐसी जगह, जहां न होंगे किश्तों के मकान.

किश्तों की ये जिंदगी, किश्तों का आसमान
किश्तों की ये बंदगी, किश्तों के अरमान

गीत: जयेश शत्रुघ्न मेस्त्री