Poem

खुद्दारी…

तुम्हारी बद्दुआ को
मैंने अपने दिल में
महफूज रखा है.
पर तुमने मेरी
दुआओं को नजरअंदाज
कर दिया.
कितनी खुद्दार हो तुम?
औरत को इतनी खुद्दारी
जचती नहीं.
तुम्हे मेरे कंधे से कंधा
मिलाना था.
इसलिए तुम मेरे
कंधे निकम्मे करने की
कोशिश की.
तुम अपने अतीत के
पुरुष मुझमे देखती रही.
दुनिया को जलील
करने की कोशिश में
तुमने मुझे जलील किया.
क्या पाया तुमने?
और
क्या खोया मैने?
तुम दिल से अपाहिज
हो गयी.
और
मैं और भी सख्त हो गया.
आज हमारा रिश्ता
बहुत पेचीदा है.
आज तुम, तुम नही हो.
और
मैं बस मैं ही हूं.
तुम्हारी खुद्दारी की वजह से
आज तुम दिल की मरीज़ हो
और मैं तुम्हारा हकीम.
तुम्हारी खुद्दारी ने
तुम्हारा खुद्दार नोच लिया.
तुम्हारी ये हालात देखकर
आज मुझे खुशी क्यों महसूस हो रही है.
शायद मेरी दबी हुई खुद्दारी
आज दस्तक दे रही हैं.

कविता: जयेश शत्रुघ्न मेस्त्री


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