मेहेंदी

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दिल पर अब काबु नही क्या करे दिल अपना रहा नही क्या करे अजी ये तो इश्क का मामला है इश्क पर जोर चलता नही क्या करे कल उन के हाथो में मेहेंदी देखी वो अब हमारे रहे नही क्या करे सोचता हूं अपने आप को बहला लूं महखाना ज्यादा दूर नही क्या करे कविता […]

चिठ्ठी

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जाने अंजाने में कल पीछे छूट गया हम आगे निकल आएं, दिल पीछे छूट गया किस की यांदों में निकलते हैं ये आंसू? यादो का वो किस्सा पीछे छूट गया’ ये जगह जन्नत से कम नही मगर घर जानेवाला रस्ता पीछे छूट गया आज उनकी चिठ्ठी आयी तो ऐसा लगा शायद हमारा रिश्ता पीछे छूट […]

बसो मेरे नैनो में पिया

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बसो मेरे नैनो में पिया पिया पिया पिया पिया बसो मेरे नैनो में पिया मेरा छीना तुने रे जीया बसो मेरे नैनो में पिया तेरे इंतजार में मैं नैना लगाये बैठी इतना किया इंतजार की होश गवाये बैठी कान्हा हाय कैसा रे जादू किया बसो मेरे नैनो में पिया… सावनी सुरत, मोहनी मुरत, यशोदा-नंद के […]

कृष्ण

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वेशीवर अब्रू कुणाची मुकाट्याने जळते षंढ दृष्टी पांडवांची फक्त पाहत राहते नव्या युगातले कौरव, नव्या युगातले पांडव सारीपाटावर मांडला तिच्या इब्रतीचा डाव किंकाळ्या तिच्या कुणाला ऐकू येत नाही डोळे असूनही का धृतराष्ट्र झाले काही? कधी सीता, द्रौपदी, कधी निर्भया रडते प्रत्येक युगात देवा असे का रे घडते? नारी सबलीकरणासाठी दुबळे ठरले शासन म्हणूनच तर माजले […]

इन्सान होना

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ना हिंदू होना, ना मुसलमान होना कुछ होना हो, तो इन्सान होना इन्सनो की भीड़ में भेडिये क्यों खडे है? क्या इन्सान भूल गये है इन्सान होना? बड़ी मुश्किल से मिलता है रुह को जिस्म ऐ इन्सान, इस सच से ना कभी अंजान होना चाहे कितनी भी कोशिश कर ले मगर तेरे बस में नही […]

बहुत हैं

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दुनियवालो में मनमानी बहुत है मगर हमने भी ठानी बहुत है कोई मेरे दिल को काबू न कर पाए दिल के दरवाजे पर निगरानी बहुत है पीठ पीछे वार कभी ना करना लोगो की जात हमने पहचानी बहुत है कभी कभी हम भी बहक जाते हैं क्या करे, दुनिया में बेईमानी बहुत है हम रोते […]

आज जाने की जिद्द ना करो

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आज जाने की जिद्द ना करो बात बाकी है, बात समझा करो आज जाने की जिद्द ना करो… दुनिया कहती है, तो कहने दो सितम ढाती है, तो ढाने दो दुनिया की झोडो कभी मेरे बारे में सोचा करो… आज जाने की जिद्द ना करो… तुम चली जाओगी तो क्या होगा रात की ढेंर में, […]

जिद ना करो

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देखो अभी तुम जिद ना करो दिल मिल गये हैं, जिस्म भी मिल जाने दो आग लग चुकी है, जी भर के जल जाने दो लगी आग यूं बुझाया ना करो देखो अभी तुम जिद ना करो शरम की चादर ओढें, क्यों चली जाती हो सितम हाय मुझपर, क्यों तुम ढाती हो ऐसी बेवफाई किया […]

दुःख

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आसवांनी भरलेले नयन झाकून घेतले आतल्या आत अश्रू शोशुन घेतले माझिया दुःखांची मलाच कीव आली थोडे हसू मी आता पांघरुन घेतले ऐकला कालच नशिबाचा हुंदका दैव माझे मीच उगळून घेतले चुकले ना दुःख तुकारामांसही लाभलेले दुःख मी उमलून घेतले ते दिवस गेले, हे दिवसही जातील मीच असे कसे बसे समजून घेतले कविता : जयेश शत्रुघ्न […]

कधी कधी

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असाच मी एकटाच बसतो कधी कधी स्वतःशीच उगाच हासतो कधी कधी कळे ना कुणी काय जादू केली ही कधी असतो तर नसतो कधी कधी कुणाच्या वाटेवरी लागले असतात डोळे न येता, का? मुसमुसतो कधी कधी दिन-रात्रीचा फरक न कळे आता कधी मरतो मी, जगतो कधी कधी कुणीतरी म्हटलं, हाय हा प्रेमात पडला आपुल्याच बळे मी […]